ईर्ष्या


 


ईर्ष्या अपने खुद के चरित्र की विनाश हैं 

ईर्ष्या एक अग्नि है 

जो  खुद को  जलाती है 


ईर्ष्या निर्दयी होती है इसमें सिर्फ जलन होती हैं 

ईर्ष्या एक विनाश का उदगार है 

ईर्ष्या में 


लोभ 


शब्दों का अभाव 


भीड़ में अकेलापन है  !


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