स्त्री
स्त्री होने की एक विडम्बना ये भी रही हैं
सभ प्रेमी बनना चाहते हैं ,
न ..
कोई मित्र नहीं बनना चाहता
मित्र जैसा पवित्र शब्द नहीं हैं स्त्री के लिए चाहे वो स्त्री हो या पुरुष
मित्र के साथ वो हर अपनी कमियों और अपनी दिल की बातें रख सकती हैं
स्त्री कभी मित्र के सामने खुद को सुन्दर नहीं बताएगी
न कभी मित्र के सामने सवरते रहेगी
Comments
Post a Comment