पुरुष
आदमी के पास ये भावनाएँ होती हैं लेकिन ,
उसे अपने मन की बात कहने की इजाज़त नहीं होती!
दर्द तो उसे भी है पर उसे रोने का भी हक नहीं
दबंग की बातों से हमेशा पिसने वाला वही मन अक्सर अपनी कलम शिकायत नहीं लिखता
पुरुष सहनशील भी है
वो अपनी इच्छाएं दबाए भी चल देता है
वो औरत के माथे का श्रृंगार भी है
वो फूल की हिफाजत करना भी जानता है !
लेकिन उसकी बेरहमी के पीछे वैसी खूबसूरती किसी ने नहीं देखी,
उन्हें कभी भी अभिनय करने की आजादी नहीं दी गई.!
जन्म से विरासत में मिले ,
उन्होंने कभी भी अपने कंधों को भेदभाव के बोझ से झुकते नहीं देखा।
उनकी मुस्कान पर आज तक किसी ने ग़ज़ल नहीं लिखी,
बेचारा झूठी शान से सब कुछ सहता है!
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