परिचय --
मैं स्वयं का परिचय क्या दु
जो स्वयं को सौंपने पहुंचा हूं
स्वयं की रूह की छाँव से मिलना नहीं होता जो परिचय लेके चल रहा मैं
हर बार उड़ता हु हवा के झोंको के साथ
कुछ प्रतिबिम्ब बनता धनक का
स्वयं को सौंपने पहुँचता हूँ!
मैं बचपन से एक बात खुद मे समाये बैठा हु
लेकिन गौर से देखो तो उसमे एक प्रौढ़ता नज़र आएगी
भटकना
चलना
स्वयं से बात करना
मुसाफिर की तरह
स्वयं को हवाओं का बहाव का हिस्सा बनाना
मैं खुद का परिचय क्या दु
मैं वो आकृति हु
जो समय के साथ उसका आकार बदलता है
लोग आकार देने वाले को कलाकार कहते है
पर उस कलाकारी को प्रौढ़ता कहते है
सहजता से अपनापन मैं
जो किसी चीज़ की तलाश में भटकता रहता हूँ
मैं सोचता हु हर बार
कविताओं को लेकर समझ आता है लेकिन
जो मेरे हृदय को पवित्र कर देता हैं
मुझे नहीं लगता कि ईश्वर मेरे हृदय में हैं
पर लगता हैं ईश्वर के हृदय में मैं हूँ !
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