प्रेम क्या है?
मुस्कान ही प्रेम की भाषा है।"
प्रेम मुझे उनके गालों से नहीं मुझे उनकी बातों से है!
प्रेम एक वजह सी है जो हमेशा साथ होती है!
प्रेम मुझे सादगी से है !
प्रेम मुझे अपनी कलम से है !
प्रेम जब किसी बच्चे के पहले बोल से माँ निकलता है,
उस माँ शब्द में प्रेम का अर्थ है।
प्रेम बहुत मासूम होता है
यह होता है बिल्कुल उस बच्चे की तरह
टूटा है जिसका दूध का एक दांत अभी-अभी।
प्रेम बहुत भोला होता है
यह होता है मेले में खोई उस बच्ची की तरह
जो चल देती है चुपचाप
किसी भी साधु के पीछे-पीछे
जिसने कभी नही देखा उसके माँ-बाप को ।
कभी-कभी मिटना भी पडता है प्रेम को
सिर्फ़ यह साबित करने के लिए
कि उसका भी दुनिया में अस्तित्व है ।
लेकिन प्रेम कभी नहीं मिटता
वह टिमटिमाता रहता है आकाश में
भोर के तारे की तरह!
जिसके उगते ही उठ जाती है गांवों में औरतें
और लग जाती है पीसने चक्की
बुजुर्ग करने लग जाते हैं स्नान-ध्यान
और बच्चे मांगने लग जाते है रोटियां
कॉपी-किताब, पेंसिल और टॉफियां ।
प्रेम कभी नही मरता
वह आ जाता है फिर से
माँ की लोरी में,
पिता की थपकी में,
वह आ जाता है पड़ोस की ख़िडकी में
और चमकता है हर रात को चाँद की तरह
प्रेम कोई प्रतिबंध नहीं है, प्रेम तो एक बहाव है ! जो बहता ही रहता है !
प्रेम एक भाव है जो, कल ,आज भी है और कल भी रहेगा !
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