दर्पण




खुद का सौंदर्य देखने के लिए 

बचपन से हम लोग दर्पण देखते आये हैं ,

एक  ही चेहरा एक ही भाव 

पर उसे देखने  हर रोज नए उम्मीद से  और  हैं ,


किसी के चेहरे के झुर्रियां  तो

कोई  बदन की नक्षीकाये में मग्न  


कितने वर्ष गुज़र गए एक चेहरे को देखते देखते 

तो  किसी ने अपने ख़ुशी को नहीं  देखा 

तो कोई कोई अपने ही  ग़म में दबा रहा,


तो   किसी की माथे  की बिंदी थी जो कभी  वर्षो  से दूर नहीं हुयी 

कितने पतझड़ गुज़र गए  पर उस बिंदी ने अपनी परछाई न छोड़ी 


उस बिंदी  लगाने वाले एक मूरत ने 

अपने नैनो के दर्पण से स्वयं को बाहर रखा 

अपनी हर पल की शिकायत दर्पण  वार्तालाप करके सुनता  है]


 साधारण स्त्री दर्पण में ही अपना सम्पूर्ण सुख देखती हैं 

ममत्व सुख प्राप्ति की अपनी पूरी यात्रा 


जिस यात्रा में वो दबा लेती  इच्छाएं 

और कुछ अपनी शिकायते ये सब दर्पण सबकुछ   देखता हैं 


दर्पण भले ही सब कुछ  भूल जाये लेकिन एक स्त्री की शक्ल हमेशा याद रखता हैं !


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